Friday, March 23, 2007

.....आज माँ घबराई हुई है

मैं दिल्ली में हूँ मेरा मन कहीं कहाँ हूँ मैं और ये ज़िंदगी मेरी कि जैसे रेशा-रेशा बिखरने को यहाँ किससे कहूँ? दोस्त वो कौन हो कि जो आधी रात को तवज्जो दे कि मैं कितनी तकलीफ़ में सचमुच ये कैसा डर मैं ऐसा सोचता हूँ कि मेरे इस तरह बेवक़्त फ़ोन करने से कहीं ख़त्म न हो बची-खुची दुआ सलाम फिर भी उठाता हूँ फ़ोन कि इतना बेबस और घुमाता हूँ जो भी नंबर वह दिल्ली का नहीं होता। ***** इस भूल-भूलइया से बाहर निकलो ये दायरों का दिलचस्प तिलिस्म है इस स्क्रीन के भीतर ज्यों बैठा है कुंडली मारे तुम्हारा ईमान बन चुका दायरों में बाँट के तुम्हारी हस्ती काट दिया है उस जादूगर ने हवा से, धूप-पानी से अब तुम भूल गए हो ज़मीन कितनी बसोअ है जिस्म तुम्हारा कुम्हलाता है अब धूल-मिट्टी से तुम कितने ख़फ़ा हो चाँद-सूरज से और नातेदारों से इस तिलिस्म को तोड़े बिना तुम बाहर आ नहीं सकते इस तिलिस्म की कुँजी कहीं खो गई है तुम्हारे भीतर उसे खोजोः इसे खोलो ये कायनात बाहर कितनी अजीम है कितनी रोशनी कितनी हसीन ****** छोटी बात नहीं हैं ये न कोई छोटा क़िस्सा ये शक-ओ- ये चेहरे बेरौनक ये बंद दरवाज़े ये धुआँ-धुआँ चीख़-ओ-पुकार ये तबाही बात नहीं हैं ये ये अख़बार नहीं बिके हुए गुलाम हैं ये सच कब बोलते हैं??? ***** फ़िजाओं में खुश्बू का मेला रंगीनियाँ बिखरी हुई है बाज़ार सज-धज के खड़े हवाओं में नगमें बच्चों के लिए आज तो दिन है मौज मस्ती का माँ कहती है लेकिन आज घर के बाहर न निकलना आज त्यौहार का दिन है आज माँ घबराई हुई है *********************** लीलाधर मंडलोई

Tuesday, March 20, 2007

Hi to all the blogmates...
Its time to learn some physics now..........
Newton's Romantic Law Universal law of Love:Love can neither be created nor be destroyed; only it can transfer from one girlfriend to another girlfriend with some loss of money "
First law of Love: A boy in love with a girl, continue to be in love with her and a girl in love with a boy, continue to be in love with him, until or unless any external agent (brother or father of the gal) comes into play and break the legs of the boy।" Second law of Love: The rate of change of intensity of love of a girl towards a boy is directly proportional to the instantaneous bank balance of the boy and the direction of this love is same to as increment or decrement of the bank balance।" Third law of Love: The force applied while proposing a girl by a boy is equal and opposite to the force applied by the girl while slapping।" HIMANSHU
hi 2 all the blogmates......one of my dearest friends sent me this 'funny-yet-eye-opening' mail.....just enjoy & think over it.....comments awaited..... The Times of India - Headlines Dated 1।1।2020!!!! !! 1. President Sonia Gandhi n Prime Minister Priyanka Gandhi receive Italy Prime Minister Rahul Gandhi at airport!!! 2. This is my last film - Rajnikant. 3. I'll surely enter in to Indian Team - Ganguly. 4. Salman, Vivek, Abhishek attend Ashiwarya rai -Dhoni wedding. 5. "Kyunki Saas bhi kabhi bahu thi" completes 25000th Episode. Tulsi virani becomes Great Great Great Great Grand-Mother. And the best part, baa is still alive!!!! हिमाँशु

Monday, March 19, 2007

खेल को खेल ही रहने दो.........

त्रिनिदाद से मानक गुप्ता बीबीसी संवाददाता भारतीय टीम की बांग्लादेश के हाथों हार के बाद रविवार को कई शहरों में प्रदर्शन हुए किंग्स्टन से बॉब वूल्मर की मौत की ख़बर जैसे ही ट्रिनिडैड पहुँची, एक साथी पत्रकार ने मुझसे कहा – एशियाई क्रिकेट ने ये पहली जान ली है. शायद इस घटना को कम शब्दों में इससे बेहतर बयान करना संभव नहीं. भारतीय टीम का अभ्यास सत्र देखने के बाद होटल वापस जाते समय टैक्सी वाले ने मुझसे पूछा – यू नो द कोच हैज़ डाइड - यानी क्या आपको पता है कोच की मौत हो गई है? मैं अभी इस सदमे से उबरा नहीं था और वूल्मर से अपनी आख़िरी मुलाक़ात को याद कर रहा था इसलिए सिर्फ़ सिर हिला कर कहा हाँ. मेरी ठंडी प्रतिक्रिया देख कर टैक्सी वाला नाराज़ हो गया और बोला – क्या क्रिकेट का खेल आपके लिए एक इन्सान की जान से बड़ा है....कितने पत्थर दिल होते हैं एशियाई लोग. टैक्सी अचानक आधे रास्ते ही सड़क किनारे रुक गई और मेरे कानों में आवाज़ आई – "गेट डाउन हियर, आई डोन्ट वॉन्ट अ कस्टमर लाइक यू" मैं थका हुआ था और दुखी भी लेकिन बीच रास्ते टैक्सी से उतर जाने की बात सुन कर मुझे होश आया और मैंने उसे समझाया कि मैं बॉब वूल्मर के बारे में ही सोच रहा हूँ, टैक्सी दोबारा चल पड़ी. होटल के बाक़ी रास्ते में उस ने सिर्फ़ इतना ही कहा – क्यों नहीं आपके यहाँ लोग खेल को खेल की तरह लेते. भारतीय मूल के उस टैक्सी ड्राइवर का सवाल जायज़ था लेकिन उसका जवाब मेरे पास नहीं था. क्रिकेट बनाम फ़ुटबॉल दक्षिण एशिया से यहाँ वर्ल्ड कप कवर करने आए पत्रकारों को तो अपने यहाँ क्रिकेटरों के पुतले जलते देखने की आदत है इसलिए जब सुबह उठते ही धोनी के घर पर हमले और कई अन्य क्रिकेटरों के घर सुरक्षा गार्ड तैनात करने की ख़बर आई तो पत्रकारों को तो कोई आश्चर्य नहीं हुआ. वूलमर की मौत ने कई सवाल उठाए हैं कुछ विदेशी पत्रकार ख़ुसर फुसर करते नज़र आए लेकिन क्वीन्स पार्क ओवल मैदान पर बड़ी संख्या में मौजूद भारतीय पत्रकारों से थोड़ा दूर हट कर. वो मुझे जानते थे इसलिए मेरे पास जाने पर भी बातचीत का मुद्दा बदला नहीं. उनमें से एक अंग्रेज़ क्रिकेट के प्रति भारत और पाकिस्तान में लोगों की दीवानगी से ख़ासा नाराज़ लग रहा था. पता नहीं क्यों, उनसे बात करते हुए तो मैंने उन्हें 1998 के फ़ुटबॉल वर्ल्ड कप में अर्जेन्टीना के ख़िलाफ़ डेविड बेकेम का रेड कार्ड याद दिला दिया जिसकी वजह से लंदन में बेकेम का पुतला जलाया गया था और उनको जान से मार डालने की धमकियाँ मिली थीं. मैंने उन्हें ये भी याद दिलाया कि कई अफ़्रीकी देशों में लोग फ़ुटबॉल के वर्ल्ड कप क्वालिफ़ायंग मैचों में ख़राब प्रदर्शन पर या कोई मौक़ा खोने पर कैसे अपने ही खिलाड़ियों के घर पर हमला कर चुके हैं....कइयों को तो जान बचा कर यूरोप में अपने क्लब में शरण लेनी पड़ी है. दबाव और तनाव उन विदेशी पत्रकारों को तो शायद मैं चुप करने में कामयाब रहा लेकिन अंदर ही अंदर जानता था कि जितने दबाव में भारत और पाकिस्तान के खिलाड़ी क्रिकेट खेलते हैं ख़ासकर चिरप्रतिद्वंद्वी टीमों के ख़िलाफ़ या फिर वर्ल्ड कप जैसी बड़ी प्रतियोगिताओं में, उतना दबाव दुनिया के किसी देश में, किसी खेल में नहीं होगा. लोग भूल जाते हैं कि ये खिलाड़ी भी इनसान हैं, अपने बचपन के न जाने कितने साल वो त्याग करते हैं और अब भी उनके जितनी मेहनत कम ही लोग करते होंगे. लेकिन लोगों को सिर्फ़ उनका पैसा और ग्लैमर दिखाई देता है सुबह धोनी को टीम बस से उतर कर नेट्स की तरफ़ जाते देख कर साफ़ ज़ाहिर था कि वो कितने परेशान हैं. द्रविड को मैंने पहले कभी इतना उदास नहीं देखा, उनकी आँखों में आँसू थे. आम तौर पर रुक कर मुझ से हँसी मज़ाक करने वाले खिलाड़ियों को आज जैसे साँप सूँघ गया था. लेकिन जिसकी ग़ैरहाज़िरी में उसके घर पर हमला हो, पुतले जलाए जाएँ, परिवार और संपत्ति की सुरक्षा के लिए घर के बाहर सुरक्षा गार्ड्स तैनात करने पड़ें – उसके मन की हालत और कोई नहीं समझ सकता. इस सबके ऊपर डर ये कि अगर वर्ल्ड कप से पहले ही दौर में बाहर हो घर जाना पड़ा तो क्या होगा. इस सबके बीच बॉब वूल्मर की मौत की ख़बर सुन कर तो भारतीय ख़ेमा मायूसी में डूब गया – एक तो इसलिए कि वूल्मर अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट बिरादरी के एक अहम सदस्य थे, दूसरे उनके साथ ग्रेग चैपल और सीनियर खिलाड़ियों के अच्छे संबंध थे और तीसरा ये कि इस घटना ने खिलाड़ियों को झकझोर कर अहसास दिलाया कि करोड़ों दीवाने लोगों की उम्मीदों का भार उठा कर अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट खेलना किस क़दर ख़तरनाक हो सकता है. भारतीय टीम के मेनेजर और चयन समिति के सदस्य संजय जगदाले ने कहा “पता नहीं लोग ये क्यों भूल जाते हैं कि यही क्रिकेटर उनको बिना त्यौहार के ख़ुशी मनाने का मौक़ा देते हैं. दीवाली से छह महीने पहले आसमान में आतिशबाज़ी का नज़ारा भी इन क्रिकेट खिलाड़ियों की मेहनत का ही नतीजा होती है लेकिन लोग भूल जाते हैं कि ये खिलाड़ी भी इनसान हैं, अपने बचपन के न जाने कितने साल वो त्याग करते हैं और अब भी उनके जितनी मेहनत कम ही लोग करते होंगे. लेकिन लोगों को सिर्फ़ उनका पैसा और ग्लैमर दिखाई देता है.” जिस धोनी को सिर पर बिठाने को तैयार थे, उसी धोनी के निर्माणाधीन मकान में तोड़फोड़ करते प्रदर्शनकारी संजय जगदाले मीडिया पर इसका पूरा दोष नहीं डालते लेकिन मुझे लगता है अगर ये 24 घंटे वाले चैनल इतने कमर्शियल न होते तो शायद हमारे खिलाड़ी इतने असुरक्षित महसूस न करते. उस टैक्सी वाले का सवाल अब भी रह रह कर मुझे परेशान कर रहा है – क्यों नहीं भारत और पाकिस्तान में लोग खेल को खेल की तरह लेते. मैचफ़िक्सिंग कांड के दौरान लोगों का ग़ुस्सा समझ में आता था लेकिन ईमानदार कोशिश के बावजूद क्रिकेट के मैदान पर नाकामी कोई जुर्म तो नहीं. क्यों पत्थरदिल न होते हुए भी भारत और पाकिस्तान के लोग दुनिया के सामने अपनी वैसी छवि पेश करते हैं? मैं तो यही कहूँगा अब भी देर नहीं हुई है. न तो ज़रा सी बहादुरी पर क्रिकेट खिलाड़ियों को हीरो बनाएँ और न ही कोई मैच, सीरीज़ या टूर्नामेन्ट हारने पर इस तरह ज़्यादती करें. इसी में सबकी भलाई है, आपकी, आपके देश की और उस खेल की जिसे आप सबसे ज़्यादा प्यार करते हैं. वरना पता कहीं क्रिकेट का ये दीवानापन देश के कोने कोने में कितने सचिन तेंदुलकर और महेन्द्र सिंह धोनी बनने से पहले ही नष्ट कर देगा.

Wednesday, March 14, 2007

..ENGINEER WO HAI......

Hello to all the blogmates...sharing with u this 'nice' poem sent to me by one of my closest friends....poems can be as simple as this one....just to change the 'mood' of this blog......'man ki baat' can not have a proper definition.......u can also send anything..just anything (language no bar...) to memoriesalive@gmail.com & memoriesalive@rediffmail.com nikhil/sohail now, enjoy this.......... Engineer Woh Hai Jo Aksar Phasta Hai Interviews Ke Sawaal Mae Badi Companiyon Ki Chaal Mae Boss Aur Client Ke Bawaal Mae Engineer Woh Hai Jo Pak Gaya Hai Meetings Ki Jhelai Mae Submissions Ki Gehrai Mae Teamwork Ki Chatai Mae Engineer Woh Hai Jo Laga Rahta Hai Schedule Ko Failane Mae Targets Ko Khiskaane Mae Roz Naye-Naye Bahane Mae Engineer Woh Hai JoLunch Time Mae Breakfast Karta Hai Dinner Time Mae Lunch Karta Hai Commutation Ke Waqt Soya Karta Hai Engineer Woh Hai Jo Pagal Hai Chai Aur Samose Ke Pyar Mae Cigeratte Ke Khumar Mae Birdwatching Ke Vichar Mae Engineer Woh Hai Jo Khoya Hai Reminders Ke Jawaab Mae Na Milne Wale Hisaab Mae Behtar Bhavishya Ke Khwaab Mae Engineer Woh Hai Jise Intezaar Hai Weekend Night Manane Ka Boss Ke Chhutti Jaane Ka Increment Ki Khabar Aane Ka Engineer Woh Hai Jo Sochta Hai Kaash!! Padhai Pe Dhyaan Diya Hota Kaash!! Teacher Se Panga Na Liya Hota Kaash!! Ishq Na Kiya Hota Aur Sabse Behtar To Ye Hota Kambakht Engineering Hi Na Kiya Hota............

Sunday, March 11, 2007

एक कालजयी रचना के सौ साल........

गोर्की की यह कालजयी रचना अपने सौवें साल में है पहली रूसी क्रांति ने कई बुद्धिजीवियों को उद्वेलित किया. मक्सिम गोर्की भी उन्हीं में से एक थे. रूस की ज़ारशाही के अत्याचार से आजिज़ मक्सिम गोर्की ने विदेश में रहते हुए वर्ष 1906 में कालजयी उपन्यास ‘माँ’ की रचना की. ‘माँ’ पहली बार 1907 में प्रकाशित हुई थी. इस पुस्तक के सौ साल हो गए हैं लेकिन अभी भी यह समूची दुनिया के पाठकों के बीच लोकप्रिय है. ‘माँ’ मानव संबंधों को सुधारने में मज़दूर वर्ग की भूमिका को रेखांकित करता है. यह उपन्यास वास्तविक घटनाओं पर आधारित है जो वोल्गा के किनारे सोमोर्वो नगर में बीसवीं सदी की शुरुआत में घटित हुई. पढ़िए ‘माँ’ का अंतिम अंश ‘अब क्या होगा?’ उसने चारों ओर नज़र दौड़ाते हुए सोचा. जासूस ने एक गार्ड को बुलाकर उसके कान में कुछ कहा और आँखों से माँ की तरफ़ इशारा किया. गार्ड ने उसे देखा और वापस चला गया. इतने में दूसरा गार्ड आया और उसकी बात सुनकर उसकी भवें तन गई. यह गार्ड एक बूढ़ा आदमी था-लंबा क़द, सफ़ेद बाल, दाढ़ी बढ़ी हुई. उसने जासूस की तरफ़ देखकर सिर हिलाया और उस बेंच की तरफ़ बढ़ा जिस पर माँ बैठी हुई थी. जासूस कहीं ग़ायब हो गया. कल राजनीतिक कैदियों पर एक मुक़दमा चलाया गया था और उनमें मेरा बेटा पावेल व्लासोव भी था. उसने अदालत में एक भाषण दिया था-यह वही भाषण है! मैं इसे लोगों के पास ले जा रही हूँ ताकि वे इसे पढ़कर सच्चाई का पता लगा सकें... गार्ड बड़े इत्मिनान से आगे बढ़ रहा था और त्योरियाँ चढ़ाए माँ को घूर रहा था. माँ बेंच पर सिमटकर बैठ गई.‘‘बस, कहीं मुझे मारें न!’’ माँ ने सोचागार्ड माँ के सामने आकर रुक गया और एक क्षण तक कुछ नहीं बोला.‘‘क्या देख रही हो?’’ उसने आख़िरकार पूछा.‘‘कुछ भी नहीं,’’ माँ ने उत्तर दिया.‘‘अच्छा यह बात है, चोर कहीं की! इस उमर में यह सब करते शर्म नहीं आती!’’ उसके शब्द माँ के गालों पर तमाचों की तरह लगे- एक...दो; उनमें कुत्सा का जो घृणित भाव था वह माँ के लिए इतना कष्टदायक था कि जैसे उसने किसी तेज़ चीज़ से माँ के गाल चीर दिए हों या उसकी आँखें बाहर निकाल ली हों... ‘‘मैं? मैं चोर नहीं हूं, तुम ख़ुद झूठे हो!’’ उसने पूरी आवाज़ से चिल्लाकर कहा और उसके क्रोध के तूफ़ान में हर चीज़ उलट-पुलट होने लगी. उसने सूटकेस को एक झटका दिया और वह खुल गया. ‘‘सुनो! सुनो! सब लोग सुनो!’’ उसने चिल्लाकर कहा और उछलकर पर्चों की एक गड्डी अपने सिर के ऊपर हिलाने लगी. उसके कान में जो गूंज उठ रही थी उसके बीच उसे चारों तरफ़ से भागकर आते हुए लोगों की बातें साफ़ सुनाई दे रही थीं. ‘‘क्या हुआ?’’‘‘वह वहां-जासूस...’’‘‘क्या बात है?’’‘‘कहते हैं कि यह चोर है...’’‘‘मैं चोर नहीं हूं!’’ माँ ने चिल्लाकर कहा; लोगों की भीड़ अपने चारों तरफ़ एकत्रित देखकर उसकी भावनाओं का प्रबल वेग थम गया था. ‘‘कल राजनीतिक कैदियों पर एक मुक़दमा चलाया गया था और उनमें मेरा बेटा पावेल व्लासोव भी था. उसने अदालत में एक भाषण दिया था-यह वही भाषण है! मैं इसे लोगों के पास ले जा रही हूँ ताकि वे इसे पढ़कर सच्चाई का पता लगा सकें...’’ किसी ने बड़ी सावधानी से उसके हाथ से एक पर्चा ले लिया. माँ ने गड्डी हवा में उछालकर भीड़ की तरफ़ फेंक दी. ‘‘तुम्हें इसका मज़ा चखा दिया जाएगा!’’ किसी ने भयभीत स्वर में कहा. माँ ने देखा कि लोग झपटकर पर्चे लेते हैं और अपने कोट में तथा जेबों में छुपा लेते हैं. यह देखकर उसमें नई शक्ति आ गई. वह अधिक शांत भाव से और ज़्यादा जोश के साथ बोलने लगी; उसके हृदय में गर्व और उल्लास का जो सागर ठाठें मार रहा था उसका उसे आभास था. बोलते-बोलते वह सूटकेस में से पर्चे निकालकर दाहिने-बाएं उछालती जा रही थी और लोग बड़ी उत्सुकता से हाथ बढ़ाकर इन पर्चों को पकड़ लेते थे. ‘‘जानते हो मेरे बेटे और उसके साथियों पर मुक़दमा क्यों चलाया गया? मैं तुम्हें बताती हूं, तुम एक माँ के हृदय और उसके सफ़ेद बालों का यक़ीन करो- उन लोगों पर मुक़दमा सिर्फ़ इसलिए चलाया गया कि वे लोगों को सच बातें बताते थे! और कल मुझे मालूम हुआ कि इस सच्चाई से...कोई भी इनकार नहीं कर सकता-कोई भी नही! भीड़ बढ़ती गई, सब लोग चुप थे और इस औरत के चारों तरफ़ सप्राण शरीरों का घेरा खड़ा था. ‘‘ग़रीबी, भूख और बीमारी - लोगों को अपनी मेहनत के बदले यही मिलता है! हर चीज़ हमारे ख़िलाफ़ है-ज़िंदगी-भर हम रोज़ अपनी रत्ती-रत्ती शक्ति अपने काम में खपा देते हैं, हमेशा गंदे रहते हैं, हमेशा बेवकूफ़ बनाए जाते हैं और दूसरे हमारी मेहनत का सारा फ़ायदा उठाते हैं और ऐश करते हैं, वे हमें जंजीर में बंधे हुए कुत्तों की तरह जाहिल रखते हैं-हम कुछ भी नहीं जानते, वे हमें डराकर रखते हैं-हम हर चीज़ से डरते हैं! हमारी ज़िंदगी एक लंबी अंधेरी रात की तरह है!’’ ‘‘ठीक बात है!’’ किसी ने दबी ज़बान में समर्थन किया.‘‘बंद कर दो इसका मुँह!? ग़रीबी, भूख और बीमारी - लोगों को अपनी मेहनत के बदले यही मिलता है! हर चीज़ हमारे ख़िलाफ़ है-ज़िंदगी-भर हम रोज़ अपनी रत्ती-रत्ती शक्ति अपने काम में खपा देते हैं, हमेशा गंदे रहते हैं, हमेशा बेवकूफ़ बनाए जाते हैं और दूसरे हमारी मेहनत का सारा फ़ायदा उठाते हैं और ऐश करते हैं भीड़ के पीछे माँ ने उस जासूस और दो राजनीतिक पुलिसवालों को देखा और वह जल्दी-जल्दी बचे हुए पर्चे बाँटने लगी. लेकिन जब उसका हाथ सूटकेस के पास पहुंचा, तो किसी दूसरे के हाथ से छू गया. ‘‘ले लो, और ले लो! उसने झुके-झुके कहा. ‘‘चलो, हटो यहां से!’’ राजनीतिक पुलिसवालों ने लोगों को ढकेलते हुए कहा. लोगों ने अनमने भाव से पुलिसवालों को रास्ता दिया; वे पुलिसवालों को दीवार बनाकर पीछे रोके हुए थे; शायद वे जानबूझकर ऐसा नहीं कर रहे थे. लोगों के हृदय में न जाने क्यों इस बड़ी-बड़ी आँखों और उदास चेहरे तथा सफ़ेद बालों वाली औरत के प्रति इतना अदम्य आकर्षण था. जीवन में वे सबसे अलग-थलग रहते थे, एक-दूसरे से उनका कोई संबंध नहीं था, पर यहां वे सब एक हो गए थे; वे बड़े प्रभावित होकर इन जोश-भरे शब्दों को सुन रहे थे; जीवन के अन्यायों से पीड़ित होकर शायद उनमें से अनेक लोगों के हृदय बहुत दिनों से इन्हीं शब्दों की खोज में थे. जो लोग माँ के सबसे निकट थे वे चुपचाप खड़े थे; वे बड़ी उत्सुकता से उसकी आँखों में आँखें डालकर ध्यान से उसकी बातें सुन रहे थे और वह उनकी साँसों की गर्मी चेहरे पर अनुभव कर रही थी. ‘‘खिसक जा यहाँ से, बुढ़िया!’’‘‘वे अभी तुझे पकड़ लेंगे!..’’‘‘कितनी हिम्मत है इसमें!’’ ‘‘चलो यहां से! जाओ अपना काम देखो!’’ राजनीतिक पुलिसवालों ने भीड़ को ठेलते हुए चिल्लाकर कहा. माँ के सामने जो लोग थे वे एके बार कुछ डगमगाए और फिर एक-दूसरे से सटकर खड़े हो गए. माँ को आभास हुआ कि वे उसकी बात को समझने और उस पर विश्वास करने को तैयार थे और वह जल्दी-जल्दी उन्हें वे सब बातें बता देना चाहती थी जो वह जानती थी, वे सारे विचार उन तक पहुंचा देना चाहती थी जिनकी शक्ति का उसने अनुभव किया था. इन विचारों ने उसके हृदय की गहराई से निकलकर एक गीत का रूप धारण कर लिया था, पर माँ यह अनुभव करके बहुत क्षुब्ध हुई कि वह इस गीत को गा नहीं सकती थी-उसका गला रूंध गया था और स्वर भर्रा गया था. ‘‘मेरे बेटे के शब्द एक ऐसे ईमानदार मज़दूर के शब्द हैं जिसने अपनी आत्मा को बेचा नहीं है! ईमानदारी के शब्दों को आप उनकी निर्भीकता से पहचान सकते हैं!’’ किसी नौजवान की दो आँखें भय और हर्षातिरेक से उसके चेहरे पर जमी हुई थीं. किसी ने उसके सीने पर एक घूँसा मारा और वह बेंच पर गिर पड़ी. राजनीतिक पुलिसवालों के हाथ भीड़ के ऊपर ज़ोर से चलते हुए दिखाई दे रहे थे, वे लोगों के कंधे और गर्दनें पकड़कर उन्हें ढकेल रहे थे; उनकी टोपियाँ उतारकर मुसाफिरख़ाने के दूसरे सिरे पर फेंक रहे थे. माँ की आँखों के आगे धरती घूम गई, पर उसने अपनी कमज़ोरी पर क़ाबू पाकर अपनी बची-खुची आवाज़ से चिल्लाकर कहाः‘‘लोगों, एक होकर जबरदस्त शक्ति बन जाओ!’’ मेरे बेटे के शब्द एक ऐसे ईमानदार मज़दूर के शब्द हैं जिसने अपनी आत्मा को बेचा नहीं है! ईमानदारी के शब्दों को आप उनकी निर्भीकता से पहचान सकते हैं एक पुलिसवाले ने अपने मोटे-मोटे बड़े से हाथ से उसकी गर्दन पकड़कर उसे ज़ोर से झंझोड़ा. ‘‘बंद कर अपनी ज़बान!’’ माँ का सिर दीवार से टकराया. एक क्षण के लिए उसके हृदय में भय का दम घोंट दने वाला धुआँ भर गया, पर शीघ्र ही उसमें फिर साहस पैदा हुआ यह धुआँ छँट गया. ‘‘चल यहाँ से!’’ पुलिसवाले ने कहा.‘‘किसी बात से डरना नहीं! तुम्हारी ज़िंदगी जैसी अब है उससे बदतर और क्या हो सकती है...’’ ‘‘चुप रह, मैंने कह दिया!’’ पुलिसवाले ने उसकी बाँह पकड़कर उसे ज़ोर से धक्का दिया. दूसरे पुलिसवाले ने उसकी दूसरी बाँह पकड़ ली और दोनों उसे साथ लेकर चले. ‘‘उस कटुता से बदतर और क्या हो सकता है जो दिन-रात तुम्हारे हृदय को खाए जा रही है और तुम्हारी आत्मा को खोखला किए दे रही है!’’ जासूस माँ के आगे-आगे भाग रहा था और मुट्ठी तान-तानकर उसे धमका रहा था. ‘‘चुप रह, कुतिया! ’’ उसने चिल्लाकर कहा. माँ की आँखें चमकने लगीं और क्रोध से फैल गईं: उसके होंठ काँपने लगे. ‘‘पुनर्जीवित आत्मा को तो नहीं मार सकते! ’’ उसकने चिल्लाकर कहा और अपने पाँव पत्थर से चिकने फ़र्श पर जमा दिए. ‘‘कुतिया कहीं की!’’जासूस ने उसके मुँह पर एक थप्पड़ मारा. ‘‘इसकी यही सजा है, इस चुड़ैल बुढिया की!’’ किसी ने जलकर कहा. वे माँ की पीठ और गर्दन पर घूँसे बरसा रहे थे, उसके कंधों और सिर पर मार रहे थे; हर चीज़ चीख-पुकार, क्रंदन और सीटियों की आवाज़ों का एक झंझावात बनकर उसकी आँखों के सामने नाच रही थी एक क्षण के लिए माँ की आँखों के आगे अंधेरा छा गया; उसके सामने लाल और काले धब्बे से नाचने लगे और उसका मुँह रक्त के नमकीन स्वाद से भर गया. लोगों के छोटे-छोटे वाक्य सुनकर उसे फिर होश आयाः‘‘ख़बरदार, जो उसे हाथ लगाया!’’‘‘आओ, चलो यार!’’‘‘बदमाश कही का!’’‘‘एक दे जोड़ का!’’ ‘‘वे हमारी चेतना को तो ख़ून से नहीं उँड़ेल सकते!’’ वे माँ की पीठ और गर्दन पर घूँसे बरसा रहे थे, उसके कंधों और सिर पर मार रहे थे; हर चीज़ चीख-पुकार, क्रंदन और सीटियों की आवाज़ों का एक झंझावात बनकर उसकी आँखों के सामने नाच रही थी और बिजली की तरह कौंध रही थी. उसके कान में एक ज़ोर का घुटा हुआ धमाका हुआ; उसकी टाँगें जवाब देने लगी; वह तेज़ छुरी से घाव जैसी चुभती हुई पीड़ा से तिलमिला उठी, उसका शरीर बोझल हो गया और वह निढाल होकर झूमने लगी. पर उसकी आँखों में अब भी वही चमक थी. उसकी आँखें बाक़ी सब लोगों की आँखों को देख रही थीं; उन सब आँखों में उसी साहसमय ज्योति की आग्नेय चमक थी जिसे वह भली-भाँति जानती थी और जिसे वह बहुत प्यार करती थी. पुलिसवालों ने उसे एक दरवाज़े के अंदर ढकेल दिया. उसने झटका देकर अपनी एक बाँह छुड़ा ली और दरवाज़े की चौखट पकड़ ली. ‘‘सच्चाई को तो ख़ून की नदियों में भी नहीं डुबोया जा सकता...’’पुलिसवालों ने उसके हाथ पर ज़ोर से मारा.‘‘अरे बेवकूफ़ो, तुम जितना अत्याचार करोगे, हमारी नफ़रत उतनी ही बढ़ेगी! और एक दिन यह सब तुम्हारे सिर पर पहाड़ बनकर टूट पड़ेगा!’’ एक पुलिसवाला उसकी गर्दन पकड़कर ज़ोर से उसका गला घोंटने लगा.‘‘कमबख्तो...’’ माँ ने साँस लेने को प्रयत्न करते हुए कहा. किसी ने इसके उत्तर में ज़ोर से सिसकी भरी. **************************************************

Friday, March 02, 2007

कालजयी मुकेश की यादगार यादें...

गायक मुकेश को याद करने की ख़ास वजह है. एक तो यही कि सिने संगीत के तौर पर अपने देश ने जो लोक संस्कृति की वैश्विक परंपरा और पहचान स्थापित की है, उसमें लता मंगेशकर के समान ही मुकेश का बहुत अहम योगदान रहा है. सही परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो भारतीय सिने संगीत और गीत को मुकेश की आवाज़ और अदायगी ने अंतरराष्ट्रीय फलक पर फैलाया. ‘आवारा हूँ’ और ‘मेरा जूता है जापानी’ जैसे गीतों ने ही पहली बार भाषाई सीमांओं को तोड़कर रूस, चीन, जापान, मंगोलिया, तुर्की जैसे देशों में भारतीय सिने संगीत को पहुँचाया था. उनको याद करने की दूसरी वजह यह भी है कि किसी सिने गायक की स्मृति में अब जो एक राष्ट्रीय पुरस्कार ‘स्माइल’ नामक सांस्कृतिक संस्था द्वारा स्थापित किया गया है वह उन्हीं के नाम पर हर साल दिया जाएगा. यह साल मुकेश जैसे कालजयी गायक की 30 वीं पुण्यतिथि का साल है और इस पुरस्कार की राष्ट्रीय जूरी में हिंदी फ़िल्मों की बहुत बड़ी बड़ी हस्तियाँ शामिल हैं. यह ख़बर सबसे पहले इसी वेबसाइट पर दी जा रही है. भारत अपनी इस लोक संस्कृति का कितना सम्मान करता है यह इसी बात से ज़ाहिर है कि सरकार ने अपने चार गायकों मोहम्मद रफ़ी, किशोर कुमार, हेमंत कुमार और मुकेश के सम्मान में डाक टिकट जारी किए थे और यह भी इसी संस्था के संयोजक राजीव श्रीवास्तव की दूरदर्शिता और लगन के कारण संभव हुआ था. बिखरी यादें मुकेश की बहुत यादें बिखरी हैं. बहुतों के पास. मेरे पास भी उनकी कुछ दुर्लभ यादें हैं. उनसे मेरी पहली मुलाक़ात मुम्बई के मशहूर चर्च गेट इलाके के स्टैंडर्ड रेस्तराँ में हुई थी. मुकेश इस रेस्तराँ को ‘सस्ते राहत’ पुकारते थे. मुझे यह शब्द बहुत अच्छा और अर्थपूर्ण लगा था. मैंने उनसे इस खूबसूरत शब्द का ओरिजन पूछा तो उन्होंने इसका श्रेय हिंदी के प्रख्यात कथाकार भगवती चरण वर्मा को दिया था. मुकेश और हिंद साहित्य के इस संबंध को लेकर मैं चकित सा रह गया. तब उन्होंने ही बताया था कि वे हिंदी साहित्य की थोड़ी बहुत किताबें पढ़ते रहते हैं. भगवती बाबू ने तो ‘चित्रलेखा’ जैसी महत्वपूर्ण और मशहूर फ़िल्म भी लिखी थी जिनका निर्देशन केदार शर्मा ने किया था. जगह की कमी की वजह से यहाँ उनकी बहुत सी बातें छोड़नी पड़ेंगी लेकिन कुछ बातें तो दर्ज़ की ही जा सकती हैं. एक तो यही कि मुकेश हरियाणा के हिसार शहर से संबंधित थे. उनका परिवार वहीं से दिल्ली आया था. वे दिल्ली में हीं जन्मे थे. यहीं से मैट्रिक करने के बाद वे फ़िल्म नगरी बम्बई में नायक अभिनेता बनने का अरमान लेकर पहुँचे थे. वह जमाना नायक-गायक कुंदनलाल सहगल की कीर्ति का जमाना था. मुकेश भी उन्हीं किंवदंती बन चुके सहगल साहब के नक़्शे कदम पर चल पड़े . यहीं रंजीत मूवीटोन में उनकी मुलाक़ात राज कपूर से हुई थी जो उस समय प्रख्यात निर्देशक केदार शर्मा के असिस्टेंट थे. इन दोनों की यह दोस्ती आजन्म रही, लेकिन यह नहीं भूला जा सकता कि मुकेश ही सबसे पहले फ़िल्मों के नायक गायक बने. राजकपूर ने उनके बाद नायक अभिनेता के रूप में दुनिया में आसमानी ख्य़ाति अर्जित की, जिनके लिए मुकेश ने अपनी दर्द और सोज़ से भरी आवाज समर्पित कर दी थी. तो हमारी मुलाकात चर्चगेट के स्टैंडर्ड ‘रास्ते राहत’ में हुई थी. जहाँ मैं भी कभी कभी कॉफी पीने जाया करता था. इस रेस्तराँ में संगीतकार शंकर जयकिशन की जोड़ी के जय किशन की एक तयशुदा मेज थी. जहाँ बैठकर वो अक्सर नाश्ता काफी लिया करते थे. साहित्य से रिश्ता मुकेश जय से मिलने वहाँ आया करते थे. तभी मुकेश ने साहित्य से अपने लगाव की गहरी बातें ज़ाहिर की थीं जो जगजाहिर नहीं है. उनके व्यक्तित्व का यही पक्ष मेरे लिए अहमियत रखता है. अगर साहित्य की किसी कृति पर फ़िल्म बनती थी तो वे उस किताब को पढ़ने की कोशिश ज़रूर करते थे. मुकेश एक कालजयी गायक होने के साथ ही बच्चन जी, नरेंद्र शर्मा, शैलेंद्र जैसे कवियों के गहरे प्रशंसक थे. वे बच्चन जी की ‘मधुशाला’ के भक्त थे और उसे रिकार्ड भी करना चाहते थे, जिसे बाद में मन्ना डे ने गाया और रिकार्ड किया. मुकेश ने शैलेंद्र के पचासों गीत गाकर उन्हें लोक स्मृति का अविस्मरणीय हिस्सा बना दिया. मुकेश ने ख़ुद ही बताया था कि जब शैलेंद्र ‘तीसरी कसम’ बना रहे थे तब उन्होंने राजकपूर अभिनीत गीतों की आत्मा में उतरने के लिए फ़णीश्वर नाथ रेणु की कहानी ‘तीसरी कसम उर्फ़ मारे गए गुलफ़ाम’ को कई बार पढ़ा था. उनके हिंदी प्रेम और भारत की समिन्वत संस्कृति से ज़ुड़े होने का इससे बड़ा प्रमाण क्या होगा कि ‘पहली नज़र’ के गीत ‘दिल जलता है तो जलने दें’ से शुरू करके तुलसीदास की रामायण को भी उन्होंने स्वरबद्ध किया था. कमलेश्वर कथाकार और समीक्षक

Friday, February 23, 2007

प्रेमचंद को संबोधित किया गुलज़ार ने......

वर्ष 2007 प्रेमचंद का 127वीं जयंती वर्ष है जानेमाने लेखक, कवि और फ़िल्मकार गुलज़ार ने प्रेमचंद को कुछ इन शब्दों में संबोधित किया है. 'प्रेमचंद की सोहबत तो अच्छी लगती है लेकिन उनकी सोहबत में तकलीफ़ बहुत है... मुंशी जी आप ने कितने दर्द दिए हैं हम को भी और जिनको आप ने पीस पीस के मारा है कितने दर्द दिए हैं आप ने हम को मुंशी जी ‘होरी’ को पिसते रहना और एक सदी तक पोर पोर दिखलाते रहे हो किस गाय की पूंछ पकड़ के बैकुंठ पार कराना था सड़क किनारे पत्थर कूटते जान गंवा दी और सड़क न पार हुई, या तुम ने करवाई नही ‘धनिया’ बच्चे जनती, पालती अपने और पराए भी ख़ाली गोद रही आख़िर कहती रही डूबना ही क़िस्मत में है तो बोल गढ़ी क्या और गंगा क्या ‘हामिद की दादी’ बैठी चूल्हे पर हाथ जलाती रही कितनी देर लगाई तुमने एक चिमटा पकड़ाने में ‘घीसू’ ने भी कूज़ा कूज़ा उम्र की सारी बोतल पी ली तलछट चाट के अख़िर उसकी बुद्धि फूटी नंगे जी सकते हैं तो फिर बिना कफ़न जलने में क्या है ‘एक सेर इक पाव गंदुम’, दाना दाना सूद चुकाते सांस की गिनती छूट गई है तीन तीन पुश्तों को बंधुआ मज़दूरी में बांध के तुमने क़लम उठा ली ‘शंकर महतो’ की नस्लें अब तक वो सूद चुकाती हैं. ‘ठाकुर का कुआँ’, और ठाकुर के कुएँ से एक लोटा पानी एक लोटे पानी के लिए दिल के सोते सूख गए ‘झोंकू’ के जिस्म में एक बार फिर ‘रायदास’ को मारा तुम ने मुंशी जी आप विधाता तो न थे, लेखक थे अपने किरदारों की क़िस्मत तो लिख सकते थे?' .................... ................

'मैंने अमृता को जी लिया, अमृता ने मुझे'....

इमरोज़ की तमाम कृतियों में अमृता साथ नज़र आती हैं. मुझे अमृता की वो नज़्म याद है- मैं तैनू फिर मिलांगी.... आज भी वो नज़्म वैसे ही गूँज रही है. मैं उसे सुन रहा हूँ. तो जो अच्छा लगता है, वो याद भी रहता है. अमृता तीन सालों तक बीमार रही और फिर चली गई पर मैं इससे साहित्य को हुए नुक़सान को क्यों याद करूँ. मैं उन दिनों को ही याद करूँगा जिनमें साहित्य को उससे लाभ मिला है. मैं नुक़सान को ही क्यों देखूँ. कोई आदमी अपने बुढ़ापे में बहुत कुछ नहीं कर पाता है. जिस्म ही साथ नहीं देता. अमृता तो लिख सकती थीं पर जिस्म ही साथ नहीं दे रहा था. उसने कभी इनकार तो नहीं किया कि वो नहीं लिखना चाहती. उसने तो तब तक लिखा, जब तक उसके शरीर ने उसका साथ दिया. उसके साथ रहना बिल्कुल सहज लगता था, बिल्कुल सहज. जो अमूमन लोगों में नहीं होता. ख़ासकर शादियों में तो बिल्कुल नहीं होता. यहाँ तो सहज रहते हुए 40 सालों से ज़्यादा जी लिए. उसने मुझे जी लिया, मैंने उसे जी लिया. अमृता के अंतिम संस्कार में एक-दो साहित्यकार ही आए. इतने सारे साहित्यकार हैं दिल्ली में, पर न तो बीमारी के वक़्त कोई आया और न ही आज. अजीत कौर आई थीं, कुछ एक और थे पर बाकी तमाम नहीं. पर अमृता को इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता. फिर समकालीन क्या कभी अपने साथ के लोगों का साथ देते हैं. किसी मुल्क में नहीं देते. यह सिर्फ़ हमारे मुल्क की ही समस्या नहीं है. पहले तो उसे प्रोत्साहित ही नहीं करता तो फिर मिलेगा क्या. तो एक जगह की बात नहीं है, सब जगह का यही हाल है. वो जब तक मर नहीं जाता, उसके बारे में बात नहीं करते हैं. कई दिनों से कैनवस छूटा हुआ है पर मुझे लगता है कि जीना ज़रूरी है, पेंटिंग करना ज़रूरी नहीं. अगर आगे कभी कैनवस पर काम शुरू किया तो अमृता का प्रभाव भी रहेगा. जो अच्छा असर होता है, वो तो रहता ही है, यह भी रहेगा. इमरोज़

Sunday, February 18, 2007

प्रेम दिवस पर.....

वैलेंटाइन दिवस- कुछ तथ्य कुछ आँकड़े पूर्णिमा वर्मन विश्व भर में ढेरों प्रेमियों द्वारा 14 फरवरी का दिन प्रेमदिवस के रूप में मनाया जाता है। लाखों-करोड़ों प्रेमी/प्रेमिका अपने प्रेमियों/प्रेमिकाओं के नाम इस दिन पत्र, फूल और उपहार भेजते हैं।बाज़ार और फुटपाथ हृदय के आकार के लैटरपैड और लिफ़ाफ़ों से भर जाते हैं। जिधर नज़र दौड़ाएँ, दिल ही दिल नज़र आते हैं। दिल के आकार की मिठाइयाँ, दिल के आकार के केक, चॉकलेट, टॉफी और यहाँ तक सैंडविच को भी दिल का आकार दे दिया जाता है। साबुन के डिब्बे, इत्र, हर चीज़ बस दिल है।मुस्लिम देश होने के बावजूद दुबई के सोना बाज़ार में दिल का ज़बरदस्त बोलबाला रहता है- सोने के दिल, चांदी के दिल, हीरे और कीमती नगों के दिल, जड़ाऊ दिल, मीनाकारी वाले दिल, संदेश खुदे दिल, दिल के आकार की घड़ियाँ, पेंडेंट, टॉप्स और अंगूठियाँ। ऐसे भी सौदे होते हैं कि एक हज़ार दिरहम के गहने ख़रीदिए और हीरे का एक दिल मुफ्त ले जाइए। यह दिल इतना छोटा होता है कि इसे देखकर बरबस आपके ओंठों पर यह गीत आ जाए- दिल है छोटा सा...उपहार तो उपहार है, उसकी कीमत या आकार का कोई मूल्य नहीं। मूल्य तो उसके पीछे छिपी भावना का है। बस तो फिर इस भावना से अभिभूत उपहार का एक पैकेट बँधवाइए और अपने प्रेमी या प्रेमिका का नाम पता दे दीजिए। पैकेट को आपके प्रेम सहित वहाँ पहुँचा दिया जाएगा। ज़रूरी नहीं कि इस पैकेट पर आपका भी नाम पता हो। इस तरह आप अपनी प्रेमिका को चौंका सकते हैं मानों कह रहे हों - बूझो तो कौन? या रूठे प्रेमी को मना सकते हैं या कोई नया प्रेम संबंध स्थापित कर सकते हैं। किसी शायर ने कहा भी है -'कभी रोना कभी हँसना, कभी हैरान हो रहनामुहब्बत क्या भले चंगे को दीवाना बनाती है।'इस शेर को पढ़कर लगता है कि यह किसी ऐसे प्रेमी या प्रेमिका का चित्रण है, जिसके पास 14 फरवरी को एक गुमनाम प्रेम उपहार आ पहुँचा है और वह उसके भेजने वाले का पता नहीं लगा पा रहा है। लिखते समय शायर साहब के दिमाग़ में यह कल्पना भले ही न आई हो। गुमनाम प्रेम प्रदर्शन की यह परंपरा कब, क्यों और कैसे इस पर्व के साथ जुड़ गई इसका कोई प्रमाण नहीं मिलता। हाँ सबसे पुराना वैलेंटाइन कार्ड जो ब्रिटिश म्यूजियम में संरक्षित है, वह सन 1400 का है। सन 1800 से वैलेंटाइन डे का व्यवसायीकरण शुरू हुआ और आज उपहार व अभिनंदन पत्र बनानेवाली कंपनियाँ इसे बहुत बड़े प्रमोटिंग उत्सव के रुप में देखती हैं।प्रेम पत्रों और प्रेम-उपहारों ने अनोखे आँकड़े भी कायम किए हैं और भारत भी इसमें पीछे नहीं छूटा है। सबसे महँगा प्रेमदिवस उपहार बड़ौदा के गायकवाड़ ने 14 फरवरी 1891 में अपनी प्रेमिका को भेजा था जिसका मूल्य लगभग 47 हज़ार पौंड था। प्रेमिकाओं में अब तक के सर्वाधिक लोकप्रिय नामों में एक हैं ब्रिटेन की महारानी ऐलिजबेथ। उन्हें हर वर्ष हज़ारों अनाम प्रेमपत्र और अभिनंदन कार्ड इस अवसर पर मिलते हैं। कहते हैं कि पहला वैलेंटाइन संदेश ड्यूक ऑफ ओरलिन्स ने 1415 में अपनी पत्नी को भेजा था, जब वह टॉवर आफ़ लंडन में कैदी का जीवन बिता रहा था। यह संदेश कविता के रूप में था, जिसे बाद में ब्रिटिश लाइब्रेरी में संग्रहित किया गया। आज प्रेम दिवस के पत्रों की संख्या इतनी बड़ी है कि किसी भी लाइब्रेरी के लिए इन्हें संग्रह करना संभव नहीं। 1979 में केवल ब्रिटेन में 2 करोड़ सत्तर लाख प्रेम पत्रों और कार्डों से डाक विभाग को निपटना पड़ा था, जिनमें से साठ लाख केवल लंदन में भेजे गए थे। 1980 में यह संख्या बढ़ कर 7 करोड़ 72 लाख तक पहुँच गई जो इस पर्व की बढ़ती हुई लोकप्रियता की ओर संकेत करती है। आज केवल यू एस ए में दस करोड़ से ऊपर अभिनंदन पत्र इस अवसर पर भेजे जाते हैं। समाचार पत्रों के व्यक्तिगत कॉलमों में 14 फरवरी को प्रकाशित होने वाले अनाम प्रेमी प्रेमिकाओं के प्रेम संदेशों की संख्या इनसे अलग है। यूरोपीय देशों के समाचार पत्रों इस दिन कई-कई कॉलम केवल प्रेमसंदेशों से भरे रहते हैं। भारतीय समाचार पत्रों में भी ऐसे संदेश देखे जा सकते हैं।लोग समझते हैं कि सबसे ज़्यादा वैलेंटाइन डे संदेश प्रेमियों-प्रेमिकाओं को भेजे जाते हैं। लेकिन आँकड़े कहते हैं कि वैलेंटाइन डे संदेश पाने वालों में सबसे ऊपर हैं- अध्यापक अध्यापिकाएँ उसके बाद क्रमानुसार नीचे आते हैं बच्चे, माँ और पत्नी। इसके बाद स्थान आता है प्रेम करने वालों का। 3 प्रतिशत वैलेंटाइन संदेश पालतू जानवरों के हिस्से में आते हैं।यह त्योहार रोमन साम्राज्य और ईसाई धर्म से जुड़ा है। प्राचीन काल में इसे जूनों देवी की उपासना से संबद्ध किया जाता था। जूनों प्रेम और सौंदर्य की देवी थी और रोमन नागरिकों का विचार था कि वे युवतियों को प्रेम और विवाह में सफलता का आशीर्वाद देती हैं। इस अवसर पर देवी की पूजा होती, पार्टियाँ दी जातीं, उत्सव बनाया जाता और युवक युवतियाँ देवी से अपने प्रिय व्यक्ति को पति या पत्नी के रूप में माँगते। बाद में इसका स्वरूप बदला और इसे संत वेलेंटाइन से संबंधित कर दिया गया। क्लादियस द्वितीय के शासनकाल में संत वेलेंटाइन नामक लोकप्रिय बिशप था, जिसका देहांत 14 फरवरी 270 ईस्वी को हुआ तो इस पर्व को उनकी याद में 14 फरवरी को ही मनाया जाने लगा। गिरजाघरों में इस अवसर पर संत वेलेंटाइन की स्मृति में प्रार्थनाएँ होती रहीं और जनसामान्य ने इस दिन भेजे जाने वाले प्रेमपत्रों का नाम ही वेलेंटाइन रख दिया। आज यह पर्व जाति और धर्म की सीमा से परे हर धर्म के प्रेमियों को महत्वपूर्ण पर्व बन गया है।भारतीय साहित्य में बसंत को प्रेम की ऋतु कहा गया है। प्राचीन भारत में बसंत पंचमी के अवसर पर होने वाली कामदेव की पूजा भी वसंत और प्रेम के घनिष्ठ संबंधों को स्पष्ट करती है। यही एक प्रमुख कारण पश्चिम में संत वेलेंटाइन डे मनाने का भी है। प्यार के पर्व का प्यार के मौसम से संबंध होना स्वाभाविक भी है। यूरोप और एशिया के अधिकतर देशों में इस समय तक कड़क सर्दी का अंत हो जाता है और अच्छे मौसम का प्रारंभ हो जाता है। बर्फ़ पिघलने लगती है, ठंडी हवाएँ बहना बंद हो जाती हैं और गुनगुने मौसम की सवारी दिखाई देने लगती है, यानी या तो बसंत आ जाता है या आनेवाला होता है। चारों तरफ़ हरियाली फैली होती हो, रंग-बिरंगे फूलों से बगीचे भरे हों तो किसका मन प्रियजनों को याद करने का उन्हें उपहार देने का न करेगा? बहुत प्राचीनकाल में ऐसे ही मौसम में किसी एक प्रेमी ने वैलेंटाइन संदेश या उपहार भेजा होगा और फिर इसने परंपरा का रूप ले लिया होगा।फूलों का इस पर्व से गहरा नाता है। लाल गुलाब का फूल प्रेम का प्रतीक माना जाता है इसलिए वैलेंटाइन डे पर सबसे अधिक माँग इसी फूल की रहती है। ब्रिटिश लोग इस एक दिन में फूलों पर साढ़े तीन करोड़ पाउंड खर्च कर देते हैं। ख़रीदे जाने वाले फूलों में लाल गुलाबों की संख्या लगभग एक करोड़ होती है। अमेरिका में 60 प्रतिशत गुलाबों की पैदावार अकेले कैलिफ़ोर्निया प्रांत में होती हैं लेकिन उत्तरी अमेरिका में वैलेंटाइन डे पर फूलों की इतनी माँग होती है कि इस अवसर पर बिकने वाले अधिकतर गुलाब आयातित होते हैं। सबसे ज़्यादा गुलाब दक्षिण अमेरिका से आयात किए जाते हैं। वैलेंटाइन डे के तीन दिनों के भीतर यहाँ 11 करोड़ से अधिक फूलों का सौदा होता है जिनमें 5 करोड़ से अधिक संख्या लाल गुलाबों की होती है। इनमें से 73 प्रतिशत फूल पुरुषों द्वारा ख़रीदे जाते हैं और केवल 27 प्रतिशत महिलाएँ अपना धन इस दिन फूलों पर खर्च करती हैं। यहाँ यह जान लेना भी ज़रूरी है कि गुलाबी गुलाब कृतज्ञता का प्रतीक जिसे देकर आप कह सकते हैं- धन्यवाद। सफ़ेद गुलाब कहता है- आप अनमोल हैं, आपकी याद में..., पीला गुलाब कहता है- मेरे दोस्त बनोगे? और लाल गुलाब कहता है- मुझे प्यार है तुमसे।बात फूलों की हो तो पक्षियों को कैसे भूला जा सकता है? पक्षियों से संबंधित अलग अलग तरह के विचारों को वैलेंटाइन डे के साथ जोड़कर देखा जाता है.। कुछ जगहों पर विश्वास किया जाता है कि यदि वैलेंटाइन डे के दिन किसी लड़की के सिर पर से रॉबिन उड़ कर गुज़रे तो उसका विवाह एक नाविक से होता है, अगर वह पक्षी गौरैया हो तो उसका विवाह ग़रीब घर में होता है पर वह बहुत सुखी रहती है और जिस लड़की को इस दिन गोलफिंच के दर्शन हो जाएँ उसका विवाह किसी करोड़पति से होता है। मध्यकाल में इंग्लैंड और फ्रांस के लोगों का विश्वास था कि पक्षी फ़रवरी के मौसम में अपने जोड़े बनाते हैं इसलिए फ़रवरी का मध्य यानी 14 फरवरी रोमांस के लिए सबसे उपयुक्त दिन है।आज यह पर्व न केवल अपरिचित प्रेमियों को नज़दीक लाता है, बल्कि जो प्रेमी-प्रेमिका एक दूसरे से परिचित हैं उनके लिए भी इस पर्व का कुछ कम महत्व नहीं। कुँवारे लोग विश्वास करते हैं कि प्रातःकाल सोकर उठते ही जिस युवक या युवती पर उनकी दृष्टि पड़ेगी, वही उनका जीवनसाथी होगा। कुछ लोग प्रिय के दर्शन की आशा में जब तक उसकी आवाज़ कान में न पड़े बिस्तर ही नहीं छोड़ते जबकि कुछ इस दिन सुबह उठते ही अपने-अपने प्रेमिकाओं का दरवाज़ा खटखटाने पहुँच जाते हैं। जो प्रेमी-प्रेमिकाएँ सुबह-सुबह नहीं मिल सकते, वे एक-दूसरे को फ़ोन करते हैं, ताकि जो आवाज़ इस दिन कान में सबसे पहले पड़े वह उनके प्रेमी या प्रेमिका की ही हो। दावतें और प्रीतिभोज हर पर्व की तरह इस पर्व की भी विशेष शोभा है।आज के भौतिक युग में जब हम मानवीय संवेदनाओं को कम महत्वपूर्ण आँकते हैं, तब इस प्रकार के संवेदनशील पर्वों का महत्व और भी बढ़ जाता है। आवश्यकता इस बात की है कि हम इसकी बाहरी चमक-दमक में न खो जाएँ, बल्कि इसमें निहित प्रेम की गरिमा और गहराई को पहचानें। इस पर्व को प्रेमियों या परिवार के पर्व के रूप में संकुचित न करके यदि इसके दायरे को समस्त मानवता के प्रति प्रेम के रूप में विकसित किया जाए बात ही कुछ और होगी। यदि ऐसा हो सके तो हम कम से कम दिन तो भौतिकता और मशीनी जीवन के घेरे से निकल कर मानवीय संबंधों और एहसासों के स्तर पर जी सकेंगे। जिसे हम व्यस्त जीवन में भले ही नकारते चले जाएँ पर अकेलेपन में कहीं न कहीं चाहते ज़रूर हैं। कवि वृंद ने भी कहा है - 'जैसो बंधन प्रेम कौ, तैसो बंध न और।'साभार : अभिव्यक्ति (teamabhi@abhivyakti-hindi.org)

kah ri dilli.....

Kah ri dilli………… YAHA HAR OR CHEHRON KI CHAMAK JAB BHI HAI MILTI MUSKURAATI HAI, YAHA PAAKAR ISHAARA ZINDGI LAMBI SADAK PAR DAUD JAATI HAI, SUBAH KA SURYA THAKTA HAI TO KHAMBHON PAR CHAMAK UTHTI HAIN SHAAMEIN, YAHAA HAR SHAAM PYAALON MEIN LACHAKTI HAI, NAHAATI HAI DUKH THIKAANA DHUNDHTA HAI, SUKH BAHUT RAFTAAR MEIN HAI.. MAA MAGAR WO SUKH NAHI HAI JO TUMHAARE PYAAR MEIN HAI.............. YAHAA KOI DHUP KA TUKDAA NAHI KHELAA KIYA KARTAA HAI AANGAN MEIN, SUBAH HOTI HAI YU HI, THAPKIYON KE BIN,KAMRE KI GHUTAN MEIN NIT NAYE SAPNE BUNE JAATE YAHA HAIN KHULI AANKHON SE, AUR SAPNE MAR BHI JAAYEIN TO NAHI UTHTI HAI KOI TEES MAN MEIN GHAR KI MITTI, CHAAND, SONA, SAB YAHA BAAZAR MEIN HAI... MAA MAGAR WO.................... O MERE PRIYATAM HUMAARE MAUN ANUBHAV HAIN LAJAATE, HUM BHALAA IS SHOR-KI NAGRI MEIN KAISE AASTHA APNI BACHAATE, PREM KE ANGIN CHITERE YAHA SADKON PAR KHADE KILLOL KARTE, RAAT RADHA,DIWAS MEERA SANG, SAPNO KAA NAYAA BISTAR LAGAATE, PREM KI GARIMAA YAHAA PAR DEH KE VISTAAR MEIN HAI... HAA MAGAR WO............ KAH RI DILLI ? DE SAKEGI KABHI MUJHKO MERI MAA KA SNEH-AANCHAL, DE SAKENGE KYAA TERE VAIBHAV SABHI,MILKAR MUJHE, DUKH-SUKH MEIN SAMBAL, KYAA TU DEGI DHUYEIN-MEIN LIPTE HUYE CHEHRON KO RAUNAK?? THAKI-HAARI ZINDAGI KI RAAJDHAANI,DEKH LE APNA DHARAATAL, POORVA KI GARIMA,TU KYUN AB PASCHIMI AVTAAR MEIN HAI?? MAA MAGAR WO........................ nikhil anand giri memoriesalive@rediffmail.com